Friday, 13 January 2017



मार्क्स के विचारों की अगुवाई में दुनिया की पहली समाजवादी क्रांति 1917 में रूस में हुई. यह साल उस क्रांति का शताब्दी वर्ष है.भले आज सोवियत रूस न रहा हो लेकिन न तो समाजवाद का सपना खत्म हुआ है और न ही मार्क्स के विचारों की महत्ता.समाजवाद क्या है और क्यों जरुरी है आइये डॉ. कार्ल हेनरिक मार्क्स के इंटरव्यू से समझें.

   क्रांति किसी पार्टी द्वारा नहीं होगी-कार्ल मार्क्स

            साक्षात्कारकर्ता- मिस्टर एच.

     प्रथम प्रकाशन-शिकागो ट्रिब्यून, 5 जनवरी 1879   

       चयन अनुवाद और प्रस्तुति –लोकमित्र गौतम

आधुनिक समाजवाद के जनक कार्ल 18 दिसम्बर 1878 को लंदन के उत्तर पश्चिम इलाके में हैवरस्टोक पहाड़ी स्थित एक छोटे से घर में रह रहे थे। 1844 में उन्हें अपनी मातृभूमि जर्मनी से निष्काषित कर दिया गया था। आरोप था, क्रांतिकारी सिद्धांतों  का प्रचार। हालांकि 1848 में वह लौटे मगर कुछ ही महीनों में उन्हें पुनः निर्वासित कर दिया गया। इसके बाद वह अपने पेरिस स्थित घर पर रहे। लेकिन उनके राजनीतिक सिद्धांतों  ने उन्हें वहां से भी 1849 में निर्वासित करा दिया। तब से लंदन ही उनका मुख्यालय था। उनकी दृढ़ धरणाएं शुरु से ही उनके लिए संकट का सबब रहीं।
निर्वासन के उन सालों में मार्क्स अपने विचारों की पूरे उत्साह से वकालत करते रहे जो निःसंदेह अपने विचारों पर उनके दृढ़ विश्वास का नतीजा था। हालांकि दुनिया उनके वैचारिक प्रचार को हतोत्साहित करती रही मगर कितना कर सकी यह कहना मुश्किल है। उनका तयशुदा ढंग से विस्तारित होता गया आत्म अस्वीकृत निर्वासन आज बहुत श्रद्धेय है।


इस संवाददाता ने डॉ मार्क्स से दो या तीन बार संपर्क किया और हर बार उसने उन्हें पुस्तकालय में पाया। उनके एक हाथ में सिगरेट होती और दूसरे हाथ में कोई किताब। संवाददाता का अनुमान था कि उन्हें कोई सत्तर साल के आसपास का होना चाहिए [उस समय मार्क्स की वास्तविक उम्र 60 साल थी]। उनका शारीरिक गठन शानदार था, उन्नत और प्रभावशाली। उनका मस्तिष्क बौद्धिकों का था जबकि शारीरिक संरचना यहूदी किसानों की माफिक थी। उनकी दाढ़ी और बाल काफी लंबे थे। उनके बालों का रंग धूसर [लौह भूरा] था। उनकी काली आंखें चमकदार थीं जिनके ऊपर घनी भौंहें थीं। अजनबियों के साथ बातचीत के समय वह सतर्कता बरतते थे। आमतौर पर उनके यहां विदेशियों को प्रवेश मिल जाता था; लेकिन पुराने जमाने की सी दिखने वाली उस जर्मन महिला हेलेन डेमथ को यह सख्त निर्देश था कि पितृभूमि [जर्मनी] के किसी आगंतुक को प्रवेश न दिया जाए बशर्ते उसके पास किसी का सिफारिशी खत न हो।
वह जब तक लाइब्रेरी में होते उनकी आंखों में चश्मा चढ़ा रहता। उनकी आंखें सामने वाले की बौद्धिक नाप जोख में लगी रहतीं थीं। वह बोलते समय अनियंत्रित हो जाते। इसलिए उनसे बात करते समय लोग पाते कि जैसे वह दुनिया के तमाम लोगों व चीजों के बारे में अपनी राय व्यक्त करने को व्यग्र हैं। उनके साथ होने वाला संवाद कभी भी इकहरा या एक लीक का नहीं होता बल्कि वह उतना ही विविध् और बहुआयामी होता जैसे उनके पुस्तकालय की अलमारियों में मौजूद तरह तरह की किताबें। आमतौर पर हम किसी व्यक्ति के बारे में उसके द्वारा पढ़ी जाने वाली किताबों के जरिये अनुमान लगाते हैं। लेकिन आप ही बताइये कि आप कार्ल मार्क्स को इस कसौटी पर कैसे कसेंगे जब आपको उनकी अध्ययन मेज पर शेक्सपीयर, चार्ल्स डिकेंस, मोलियर, रेजिन, मोंटेग्ने, बेकन, गोयथे, वाल्टेयर पैने, इंग्लिश, अमरीकन और फ्रेंच ब्लू बुक, रुसी भाषा में हुआ राजनीति व दर्शनशास्त्र का काम व ऐसा ही जर्मन, स्पैनिश और इतालवी भाषाओं का काम मौजूद हो। उनसे बातचीत के दौरान मैं चकित था कि वह किस तरह पिछले बीस साल की प्रमुख अमरीकी समस्याओं से वाकिफ थे।


मार्क्स न केवल अमरीकी समस्याओं के बारे में जानते थे बल्कि हमारी राष्ट्रीय एवं प्रान्तीय विधयिकाओं के बारे में उनकी सटीक आलोचना से भी मैं हतप्रभ था। उनकी तर्कसंगत और सटीक आलोचनाओं ने मुझे यह मानने पर विवश कर दिया कि उनके पास सूचनाओं का कोई गुप्त या आंतरिक स्रोत था। लेकिन हैरत की बात यह थी कि उनकी जानकारी महज अमरीका तक ही सीमित नहीं थी। समूचे यूरोप के बारे में उनकी ऐसी ही सटीक जानकारियां थीं। जब उनकी रुचि-समाजवाद-के बारे में मैंने बात की तो उन्होंने कतई इसे नाटकीयता या हवा-हवाई उड़ान के रूप में नहीं रखा जैसा कि उनके बारे में समझा जाता था। मानव समाज की मुक्ति को लेकर उनकी गरिमामयी सैद्धांतिक दृढ़ धरणा [जिसे कुछ लोग दिवास्वप्न या यूटोपियन प्लान की संज्ञा देते थे ] के प्रति न केवल मौजूदा शताब्दी में बल्कि आगे भी उत्साह एवं आस्था बनी रहेगी।
शायद डॉ कार्ल मार्क्स अमरीका में बतौर कैपिटल के लेखक और अन्तर्राष्ट्रीय समाज के संस्थापक, बेहतर जाने जाते हैं। अगर नहीं तो कम से कम इसके सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में। इस साक्षात्कार में आप देखेंगे कि डॉ  मार्क्स  इस मौजूदा अन्तर्राष्ट्रीय समाज के अस्तित्व के बारे में क्या कहते हैं? लेकिन ठीक इसी समय मैं आपको कुछ उद्धरण  1871 में प्रकाशित अन्तर्राष्ट्रीय समाज के सामान्य नियमसे दूंगा। यह नियमावली अन्तर्राष्ट्रीय समाज की आम सभा के आदेश पर छपी। इससे आप इसके उद्देश्यों और इसके अंत की न्याय संगत रूपरेखा बना सकते हैं। चौथे खंड के प्रस्तावना में कहा गया है-
-कि सर्वहारा वर्ग की मुक्ति की लड़ाई उन्हें खुद जीतनी है
-कि मजदूर वर्ग के संघर्ष से आशय एकाधिकार एवं विशेषाधिकार के लिए संघर्ष से कतई नहीं है बल्कि इस संघर्ष का लक्ष्य समान अधिकार एवं समान कर्तव्य व सभी तरह के वर्गीय शासन का खात्मा है;
-कि श्रम के सम्बंध में श्रमिकों की श्रम संसाधनों  के सरमायेदारों की आर्थिक पराधीनता, दासत्व के सभी प्रकारों के मूल में है। सभी तरह के सामाजिक दुखों, बौद्धिक निम्नता और राजनीतिक निर्भरता का भी यही कारण है;
-कि अब तक सर्वहारा वर्ग की सार्वभौमिक मुक्ति के तमाम प्रयास सभी देशों में सभी तरह के मजदूरों के बीच एकता का लक्ष्य हासिल करने में असफल रहे हैं इसलिए प्रस्तावना स्थगित आन्दोलनों हेतु एक तात्कालिक समीकरण का सुझाव देता है। यह कहता है कि अन्तर्राष्ट्रीय संघ मानता है, “बिना फर्ज के कोई अधिकार नहीं है और बिना अधिकार  के कोई फर्ज नहीं है” यह हर कामगार को समझ लेना चाहिए।
इस अन्तर्राष्ट्रीय संघ का गठन लंदन में, ‘विभिन्न देशों की कामगार संस्थाओं के बीच संपर्क व सहयोग के आधरभूत माध्यम की बदौलतहुआ। विभिन्न देशों में मौजूद सभी मजदूर संस्थाओं का एक समान लक्ष्य था, ‘सर्वहारा वर्ग की सुरक्षा, आधुनिकीकरण और पूर्ण आजादी। दस्तावेज आगे कहता है अन्तर्राष्ट्रीय संघ के सभी सदस्य, अपनी जन्मभूमि छोड़कर एक देश से दूसरे देश जाने वाले संघ के सदस्य कामगारों के साथ भाईचारापूर्ण व्यवहार करेंगे।
संघ की अपनी एक साधरण कांग्रेस थी जिसकी बैठक सालाना होती थी। एक आम सभा थी जिसने एक अन्तर्राष्ट्रीय एजेंसी का गठन किया था जो विभिन्न देशों और संघ के स्थानीय समूहों के बीच समन्वय स्थापित करती थी जिससे कि एक देश के कामगार दूसरे देशों के मजदूर आन्दोलनों और वर्ग संघर्षों से परिचित रहें। यह आम सभा अन्तर्राष्ट्रीय संघ की नई शाखाओं के खोले जाने के सम्बंध् में आवेदन प्राप्त करती व कार्यवाई करती थी। साथ ही विभिन्न प्रवर्गों के बीच उभरे मतभेदों को दूर करती जिसे एक अमरीकन मुहावरे में कहा जा सकता है कि मशीन का चलते रहना सुनिश्चित करती। आम सभा के खर्चों का भुगतान हर सदस्य से वार्षिक सहयोग के बतौर ली जाने वाली एक ब्रिटिश पेनी से होता था। इसके बाद संघीय परिषद या कमेटी और विभिन्न देशों की स्थानीय शाखाएं आती थीं। संघीय परिषद कम से कम महीने में एक रिपोर्ट आम सभा को भेजने की लिए बाध्य थी। इसी के साथ हर तीन महीने में संघीय परिषद प्रशासनिक और वित्तीय स्थिति के बारे में एक रिपोर्ट सभी शाखाओं को भेजने के लिए जिम्मेदार थी। अगर अन्तर्राष्ट्रीय संघ की आलोचना से सम्बंध्ति कुछ छपता था तो नजदीकी शाखा या समिति का दायित्व था, वह उसे जनरल काउंसिल [आम सभा] के पास भेजे। अन्तर्राष्ट्रीय संघ ने महिला कामगार शाखाओं के भी खोलने की संस्तुति की थी।




आम सभा में ये महत्वपूर्ण सदस्य थे-आर. अपलेगार्थ, एम.टी. बून, फ्रेडरिक ब्रैडनिक, जी.एच. बुटरे, ई. डेलाहाए, इयुग्ने डुपोंट [आन मिशन], विलियम हेल्स, जी. हैरिस, हर्लीमैन, जूलेस जोनार्ड, हैरियट लॉ  फ्रेडरिक लेसनर, लोचनेर, चार्ल्स  प्पफांडर, जॉन पैच, रूह्ल सैडलर, कोवेल स्टेपनी, अल्फ्रेड  टेलर, डब्ल्यू. टाउंसेड, ई. वैलेंट, जॉन वेस्टन। विभिन्न देशों के साथ पत्र व्यवहार के लिए कई सचिव नियुक्त हुए-लियो फैंकेल आस्ट्रिया और हंगरी के लिए, ए. हर्मन बेल्जियम के लिए, टी. मोटेरशेड डेनमार्क के लिए, ए. सेरैल्लर फ्रांस के लिए, कार्ल मार्क्स जर्मनी और रूस के लिए, चार्ल्स रोचेट हालैंड के लिए, जे.पी. मैक्डोनेल आयरलैंड के लिए, फ्रेडरिक एंगेल्स इटली और स्पेन के लिए, वालेरी रोब्लेवस्की पोलैंड के लिए, हर्मन जंग स्विट्जरलैंड, जे.जी. इकैरियस अमरीका के लिए, ली मूजे कुछ फ़्रांसीसी और कुछ अमरीकी शाखाओं के लिए।
डॉ कार्ल मार्क्स के साथ इंटरव्यू की मैंने अपनी तैयारी के लिए जे.सी. बैंक्राफ्रट डेविस की उस अधिकृत रिपोर्ट को आधार स्रोत बनाया, जिसमें उन्होंने समाजवाद को बहुत स्पष्ट तरीके से और संक्षिप्त में समझाया था। मार्क्स ने मुझे बताया कि वास्तव में यह सामग्री गोथा [जर्मनी] में, मई 1875 में, समाजवादियों के पुनर्संगठित होने के दौरान तैयार रिपोर्ट से ली गयी है लेकिन उन्होंने कहा यह अनुवाद गलत है। यही नहीं उन्होंने स्वेच्छा से गलत अनुवाद को सही करने में मदद की। उन्होंने मुझे सही अनुवाद लिखाया जिसे मैं यहां दे रहा हूं।
पहलार- 20 साल के सभी युवाओं को राज्य और नगर निकायों के चुनावों में सीधे  मतदान की अनुमति हो।
दूसरा- विधयिका सीधे  लोगों द्वारा चुनी जाये। युद्ध और शांति का फैसला सीधे जनमत से हो।
तीसरा- सभी नागरिकों पर सेना का समान दायित्व हो। स्थायी सेनाएं खत्म की जाये।
चैथा-सार्वजनिक सभाओं और मीडिया से सम्बंधित सभी विशेष प्रतिबंध कानूनों को खत्म किया जाये।
पांचवां-सभी कानूनी लड़ाइयां खर्चमुक्त हों। कानूनी प्रक्रियाएं आम लोगों द्वारा संचालित हों।
छठवां- शिक्षा का दायित्व राज्य पर हो। यह पूरी तरह से मुफ्त हो। विज्ञान तथा धर्म मानने की आजादी हो।
सातवां-सभी अप्रत्यक्ष कर खत्म किये जाएं। राज्य और नगर निकायों द्वारा आय पर सीधे कर लगाये जाएं।
आठवां- मजदूरों को संगठन बनाने की आजादी हो।
नवां- मजदूरों के लिए मजूदर दिवस कानूनी तौरपर तय किया जाये। महिलाओं का काम सीमित किया जाये और बच्चों को सभी तरह की मजदूरी से दूर रखा जाये।
दसवां- मजदूरों की जिंदगी और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए अरोग्यकारी स्थितियों की सुनिश्चितता हेतु कानून बनाये जायें साथ ही उन्हें अपने निवास व कार्यस्थल के चयन की सुविध हो।
ग्यारवां- जेल में सम्माननीय श्रम की व्यवस्था हो।
बैंक्राफ्रट डेविस की रिपोर्ट में एक बारहवां उपबंध है जो इन सबमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है उसे यूं पढ़ें, ‘राज्य औद्योगिक संस्थाओं के लिए सहायता करेगा और उधार देगा, लोकतांत्रिक दिशा निर्देशों के तहत।मैंने डॉ. से पूछा आप इसे कैसे भूल गये? डॉ मार्क्स ने जवाब दिया-
“1875 में जब गोथा में पुनर्गठन हुआ तब सोशल डेमोक्रेटों का एक धड़ा मौजूद था। जिसमें एक शाखा का विभाजन लाजले द्वारा कर दिया गया और दूसरे धड़े में वो थे जिन्होंने औद्योगिक संगठन का आम कार्यक्रम स्वीकार किया, वह आइसेंच पार्टी कहलाये। दरअसल वहां बारह सूत्री कार्यक्रम नहीं रखा गया था। इसे आम परिचय में लाजेलियनों द्वारा रखा गया था। इसके बाद इस पर डेविस द्वारा कभी कुछ नहीं कहा गया। दरअसल इसे कार्यक्रम में एक सूत्र के तहत नहीं रखा गया बल्कि कार्यक्रम के एक हार्दिक सिद्धांत के तहत इसे गंभीरता से लिया गया।”
लेकिन मैंने कहा, ‘समाजवादी आमतौर पर अपने आंदोलन के चरम पर पहुंचकर संसाधनों को अंततः सार्वजनिक सम्पत्ति के रूप में देखते हैं।
हां, हम कहते हैं और मानते हैं कि हमारे आंदोलन की अंतिम परिणति यही होनी है। लेकिन समय, शिक्षा और उच्च सामाजिक संस्थाओं की मौजूदगी पर ही यह निर्भर करता है।




यह घोषणापत्रमैंने सवाल खड़ा किया, ‘सिर्फ जर्मनी व एक और दो देशों में लागू होता है।
हां, ‘ओहो!उन्होंने जवाब दिया, ‘अगर अपने निष्कर्षों पर आप यही पहुंचते हैं तो कोई बात नहीं इसका मतलब है आप पार्टी की गतिविधियों  के बारे में कुछ नहीं जानते। इन तमाम कार्यक्रमों का जर्मनी में कोई महत्व नहीं है। स्पेन, रूस, इंग्लैंड और अमरीका के लिए ये कहीं ज्यादा उपयुक्त हैं क्योंकि वहां की असाधरण स्थितियां इनके कहीं निकट है। हां, यह अपने अंत में जरूर एक जैसी महत्ता रखता है।
और यह मजदूरों की सर्वोच्चता है।
यह मजदूरों की मुक्ति है।
क्या यूरोपीय समाजवादी भी इस आंदोलन को इतनी ही गंभीरता से लेते हैं जितना कि अमरीका ले रहा है?’
हां, यह किसी भी देश के विकास का कुदरती नतीजा है। 50 साल पहले जब इंग्लैंड में यह आंदोलन अस्वीकृत हो गया तो कहा गया कि यह आंदोलन तो विदेशियों की चाल है और याद रखिये 1857 के पहले अमरीका में समाजवाद के लिए भी यही बात कही जा रही थी। सिर्फ इसे मजदूर आंदोलनों ने स्पष्ट किया। मजदूर संगठन बनने लगे। फिर कारोबारी असेम्बलियों का गठन हुआ और इस तरह अलग अलग उद्योग क्षेत्रों के मजदूर इकट्ठे हुए। इसके बाद राष्ट्रीय मजदूर संगठन बने। अगर आप प्रगति की इस क्रमिकता को याद रखें तो आप देख सकते हैं कि कैसे समाजवाद बिना किसी विदेशी मदद के विभिन्न देशों में फल-फूल और बढ़ रहा है। ...और इसकी मुख्य वजह यह है कि पूंजी का संकेन्द्रण हो रहा है। जिसने मजदूर और मालिकों के रिश्तों को बदलकर रख दिया है।
मैं आपसे पूछता हूं समाजवाद ने क्या किया है?’
“दो चीजें’’ वह पलटे, ‘समाजवादियों ने पूंजी और श्रम के बीच आम सार्वभौमिक संघर्ष को उजागर किया है...।विभिन्न देशों के मजदूरों के बीच आपसी समझदारी को दर्शाने के लिए सार्वदेशिकता एक नया अध्याय है। यह बहुत जरूरी हो गयी है क्योंकि तमाम पूंजीपति विभिन्न देशों से मजदूरों का आयात कर रहे हैं। सिर्फ अमरीका में ही देशी मजदूरों की कब्र विदेशी मजदूरों के जरिये खुदवाने की साजिश नहीं नहीं हो रही बल्कि फ्रांस, इंग्लैंड और जर्मनी में भी यही हो रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय सम्बंधें का उभार विभिन्न देशों के पूंजीपतियों को यह जताने का जरिया बन गया है कि समाजवाद सिर्फ स्थानीय स्तर पर ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी एक समस्या है और इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूरों पर कार्रवाई करके ही हल किया जा सकता है। सर्वहारा वर्ग यकायक उठ खड़ा होता है बिना यह सोचे कि इस आंदोलन की अंतिम परिणति क्या होगी? समाजवादी आंदोलन पैदा नहीं कर रहे सिर्फ कामगारों को यह बता रहे हैं  कि उनके इस चरित्र का नतीजा क्या होगा?’
इसका मतलब हुआ मौजूदा व्यवस्था को उखाड़ फेंकना।मैंने बीच में हस्तक्षेप किया।
जमीन और पूंजी की यह व्यवस्था वास्तव में सरमायेदारों के हाथ में है, ‘उन्होंने बात जारी रखी’, और कामकाजी ताकत मजदूरों के हाथ में है। सामानों को बेचने के मामले में हम एक ऐतिहासिक दौर से गुजर रहे हैं जो मौजूदा दौर को दफन कर देगा और इसकी जगह एक उच्च सामाजिक स्थिति को मौका देगा।
हम हर तरपफ समाज में बंटवारा देख रहे हैं। आधुनिक देशों में औद्योगिक संसाधनों का विकास दो वर्गों के बीच प्रतिद्वंदिता के साथ आगे बढ़ रहा है। समाजवादी नजरिये से क्रांति के लिए मौजूदा ऐतिहासिक दौर पहले से ही तैयार है। तमाम देशों में मजदूर संगठनों ने अपने राजनीतिक संगठन बना लिये हैं। अमरीका में एक स्वतंत्र मजदूरों की पार्टी की आवश्यकता प्रत्यक्ष तौरपर दिखाई पड़ रही है। अमरीकी मजदूर राजनीतिज्ञों पर ज्यादा भरोसा नहीं करते। पक्ष और विपक्ष के तमाम गुट विधायिका तक सीमित होकर रह गये हैं और राजनीति कारोबार बन गयी है। लेकिन इस मामले में अमरीका अकेला देश नहीं है। चीजें तेजी से सतह पर आ रही हैं। सागर के इस तरफ कम पाखंड है।
मैंने उनसे कहा मुझे बताएं जर्मनी में समाजवादी पार्टी के तेजी से विकास के क्या कारण हैं? उन्होंने जवाब दिया मौजूदा समाजवादी पार्टी अंत में आती है। जर्मनी में इंग्लैंड और फ्रांस की तरह कोई स्वप्निल योजना नहीं है जो प्रेरित करे। दूसरे लोगों के मुकाबले जर्मन लोग ज्यादा सैद्धांतिक हैं। जर्मन लोग पूर्व के कुछ व्यवहारिक अनुभव रखते हैं। आप देख सकते हैं कि दूसरे देशों के मुकाबले मौजूदा आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था जर्मनी के लिए एक नया अनुभव है। वास्तव में जर्मनी में वो सवाल उठ खड़े हुए हैं जो आमतौर पर इंग्लैंड और फ़्रांस  में नदारद हैं। यही कारण है कि जर्मनी में सर्वहारा वर्ग ने समाजवादी सिद्धांतों को आत्मसात कर लिया है। यही कारण है कि लगभग आधुनिक औद्योगिक विकास के शुरू से ही उन्होंने एक स्वतंत्र राजनीतिक पार्टी का गठन किया है। जर्मनी की संसद में उनके अपने निजी प्रतिनिधि हैं। जर्मनी की संसद में सरकार की नीतियों का किसी भी विपक्षी पार्टी ने विरोध नहीं किया सिवाय मजदूरों के राजनीतिक प्रतिनिधियों के और यह कोई एक दिन में नहीं हुआ। यह विकास धीरे-धीरे हुआ है। हालांकि राजनीतिक पार्टी को अपना आकार ग्रहण करने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि अगर जर्मनी का मध्य वर्ग कायर नहीं हुआ, अमरीका और इंग्लैंड की तरह तो सरकार के विरुद्ध सभी राजनीतिक काम उनके द्वारा किया जाना चाहिए।
मैंने डॉ. मार्क्स से पूछा अन्तर्राष्ट्रवादियों के क्रम में लाजेलियनों की समीकरणात्मक ताकत क्या है?
लाजले की पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं है। डॉ मार्क्स ने जवाब दिया। हां, हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि कुछ लोग इस तरह की श्रेणी पर यकीन करते हैं मगर इनकी संख्या बहुत कम है। लाजले ने हमारे आम सिद्धांत को प्रत्याशा दी है जब वह 1848 की प्रतिक्रिया में प्रवृत्त हुए। उन्होंने अनुमान लगाया था कि वह मजदूरों और उद्योगपतियों के बीच सहयोग की वकालत करके मजदूरों के हित ज्यादा बेहतर तरीके से साध् सकेंगे। इस उम्मीद ने उन्हें इस कदर झकझोरा कि वह सक्रिय हो गये। उन्होंने इसे आंदोलन के अंत के रूप में देखा। मैंने उन्हें इस प्रभाव के बारे में चिट्ठी लिखी।
क्या इसे आप उनका रामबाण कहेंगे?’
बिल्कुल। उसने बिस्मार्क से बात की कि उसके दिमाग में इसकी क्या अवधरणा है? बिस्मार्क ने लाजले को प्रोत्साहित किया और हर संभव मदद भी पहुंचाई।
उसका लक्ष्य क्या था?’
वह दरअसल सर्वहारा वर्ग को उस मध्य वर्ग के विरुद्ध इस्तेमाल करना चाहता था जो 1848 के संकट की जड़ में था। इस संकट को इसी वर्ग ने हवा दी थी।





कहा जाता है कि डॉक्टर आप समाजवाद की सोच और शरीर दोनों हैं और आपके इस घर से ही समाजवाद के तमाम संगठनों, संस्थाओं के तार खिंचे हुए हैं, क्रांति वगैरह होने वाली है क्या? आप क्या कहेंगे इस बारे में?
सवाल सुनकर बूढ़ा सज्जन मुस्कुराया, ‘मुझे पता है यह बहुत फूहड़ है और एक किस्म से बेहद दयनीय भी कि दो माह पहले बिस्मार्क ने नार्थ जर्मन गजेट में शिकायत की कि जब वह जेसुइट आंदोलन के मुखिया बेक के साथ लीग में थे तब समाजवादी आंदोलन को इस स्थिति में देखा जो कुछ वह नहीं कर सकता।
लेकिन आपका अन्तर्राष्ट्रीय संघ तो लंदन से आंदोलन को दिशा निर्देश दे रहा है।
“अन्तर्राष्ट्रीय संघ अपने हिस्से की उपयोगिता साबित कर चुका है और यह अब बहुत दिनों तक नहीं रहेगा। पिछले कुछ सालों में समाजवाद का विकास कुछ इस शानदार तरीके से हुआ कि इसकी मौजूदगी अर्थहीन हो गयी। तमाम देशों में नये नये अखबार निकले जिन्होंने काफी कुछ बदल दिया। अन्तर्राष्ट्रीय संघ वास्तव में इसलिए बनाया गया था कि दुनियाभर के मजदूर एक साथ एक मंच पर आयें और अपनी तमाम भिन्न-भिन्न राष्ट्रीयताओं के बावजूद अपने संगठन का प्रभाव तय करें। लेकिन अलग अलग देशों में मौजूद समाजवादी पार्टियों के हितों में कोई एका नहीं है। इसे तमाम अन्तर्राष्ट्रीय नेता लंदन में बैठकर स्पष्ट कर चुके हैं। यह तय है हम विदेशी संघों को दिशा-निर्देश देते हैं जब अन्तर्राष्ट्रवादी संगठन पहली दफा हमसे जुड़े होते हैं। हम न्यूयार्क में कुछ लोगों को निकाल बाहर करने के लिए मजबूर हुए जिसमें मादाम वुडहुल थीं, सन 1871 में। तमाम अमरीकी राजनीतिज्ञ जो आंदोलन के बहाने धंधा कर रहे थे, उन्हें अमरीकी समाजवादी भली भांति जानते हैं, मैं यहां उनका नाम नहीं लेना चाहूंगा।
डॉ. क्या आप अपने अनुयायी हैं, आपको धर्म के विरुद्ध तमाम जोशीले भाषणों का श्रेय जाता है। क्या वाकई आप समूची व्यवस्था को इसकी जड़ और शाखाओं से ध्वस्त होते हुए देखेंगे?’
हम जानते हैं।कुछ क्षणों के बाद उन्होंने हिचकिचाते हुए जवाब दिया। धर्म के विरुद्ध यह हिंसक पैमाना मूर्खता है लेकिन यह एक प्रक्रिया है जिससे होकर समाजवाद गुजरता है। यह लुप्त हो जायेगा। लेकिन यह अनिवार्य रूप से सामाजिक विकास के जरिये लुप्त होना चाहिए, जिसमें शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होनी चाहिए।
बोस्टन के जोसेफ कुक को आप जानते हैं...।
हां, मैंने उनके बारे में सुना है, समाजवाद के बारे में उनकी जानकारियां बहुत ही ऊलजलूल हैं।
बाद के अपने एक लेक्चर में उसने कहा, ‘कार्ल मार्क्स को अमरीका, इंग्लैंड और शायद फ्रांस में रक्तहीन तरीके से श्रम सुधार का श्रेय दिया जाना चाहिए। लेकिन खून खराबा होगा। यह जर्मनी, रूस, इटली और आस्टेलिया में जरूर होगा।
डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘कोई भी समाजवादी ऐसा नहीं कहेगा। उसे यह भविष्यवाणी करने की जरूरत नहीं है कि रूस, जर्मनी और आस्टेलिया में खूनी क्रांति होगी और संभवतः इटली में, यदि इटलीवासियों  ने उन नीतियों को जारी रखा जिन पर फिलहाल चल रहे हैं तो फ़्रांसीसी क्रांति का दस्तावेज इन सभी देशों में निष्क्रिय रहेगा। ऐसा कोई भी राजनीतिक छात्र समझ सकता है लेकिन ये क्रांतियां जनमत के द्वारा होंगी। कोई भी क्रांति किसी पार्टी के द्वारा संभव नहीं होगी। इसे अवाम अंजाम देगी। राष्ट्र अंजाम देगा।
मेरे पास आपके भाषण का एक अंश है जो रेवेरेंड जोसेफ द्वारा मुहैया कराया गया हैमैंने कहा, यह 1871 में पेरिस में कम्युनिस्टों को सम्बोध्ति करते हुए भाषण का अंश है जो इस प्रकार है, ‘आज हम 30 लाख हैं। 20 सालों में हम 5 करोड़ से 10 करोड़ तक हो जायेंगे। फिर दुनिया हमारी होगी। सिर्फ पेरिस, लियोन, मार्शेलीज ही नहीं जिन्हें आज विद्वेषियों की राजधनी के रूप में जाना जाता है बल्कि बर्लिन, म्युनिख, ड्रेसडन, लंदन, लिवरपूल, मैनचेस्टर, ब्रसेल्स, सेंट पीटर्सबर्ग, न्यूयार्क...। एक तरह से संक्षेप में पूरी दुनिया। ...और इस नई बगावत के पहले जिसे अभी तक इतिहास नहीं जानता, अतीत किसी डरावने बुरे सपने की तरह गायब हो जायेगा। एक साथ सैकड़ों जगहों पर दावानल प्रज्वलित होगा, जो सब कुछ जलाकर खाक कर देगा यहां तक कि पुरानी यादें भी।डॉक्टर मैं उम्मीद करता हूं कि आपको यह मानने से कतई गुरेज नहीं होगा कि यह आपके भाषण का अंश है।
मैंने कभी इसका एक शब्द तक नहीं लिखा मैं कभी ऐसी बेवकूफी भरी नाटकीय बातें नहीं लिखता। मैं इस मामले में बहुत सजग हूं कि मुझे क्या लिखना है? उस समय यह ली फिगारो में मेरे हस्ताक्षर के साथ छपा था। यही नहीं इस तरह के सैकड़ों अन्य पत्र उन दिनों हवा में तैर रहे थे। मैंने लंदन टाइम्स को लिखकर ऐलान किया कि ये सभी पत्र फर्जी हैं। अगर मैं ये तमाम पत्र वाकई लिखता, जिनका लेखक मुझे बताया जा रहा है तो यकीन मानिये मुझे तमाम सहायिकाओं की जरूरत पड़ती।
लेकिन आपने पेरिस कम्युनिस्टों के प्रति सहानुभूति में लिखा तो था।
निश्चित ही मैंने इस पर विचार किया था लेकिन उस मुख्य लेख के बारे में जो एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित हुआ था। उस अंग्रेजी अखबार के पेरिस स्थित संवाददाता ने संपादकीय के जरिये भयावह गलतबयानी और दोषारोपण का प्रयास किया था। कम्यून ने सिर्फ 60 लोगों को मारा था जबकि मार्शल मैकमोहन और उनकी नरसंहारक सेना ने 60 हजार से ज्यादा लोगों का कत्लेआम किया था। लेकिन उनके विरुद्ध कभी कोई आंदोलन नहीं हुआ न उनका अपयश फैलाया गया जैसे कि कम्यून के साथ किया।
ठीक है तो आप समाजवाद के सिद्धांत की, इस पर भरोसा करने वालों के लिए हत्या और खूनखराबा के रूप में वकालत करते रहिये।
नहीं, वह महान क्षण अभी नहीं आया जब बिना खूबखराबा के आजादी मिली हो। अमरीका को भी खूनखराबे के बाद ही आजादी मिली थी।मार्क्स ने जवाब दिया। नेपोलियन ने फ्रांस पर एक रक्तरंजित प्रक्रिया से ही कब्जा किया था और फिर  उसे उसी तरीके से अपदस्थ किया गया। इटली, इंग्लैंड, जर्मनी और उन तमाम देशों में इस बात के सबूत भरे पड़े हैं कि परिवर्तन खूनखराबे से ही होते हैं। उन्होंने आगे कहा-यह कोई नयी बात नहीं है जो मुझे बड़ी कठिनता से कहनी पड़े। ओरसिनी ने नेपोलियन को मारने की कोशिश की। राजा दूसरे लोगों के मुकाबले इस तरह कहीं ज्यादा मारे गये हैं। जेसुइट मारे गये, क्रामवेल के समय प्यूरीटन्स मारे गये और यह सब कुछ तब हुआ जब दुनिया में अभी समाजवाद का जन्म भी नहीं हुआ था। ये तमाम प्रयास राजाओं द्वारा या राज्य के द्वारा समाजवाद के लिए नहीं किये गये थे। समाजवादियों को बहुत पश्चाताप होगा अगर मौजूदा जर्मन शासक मारा जायेगा। वह जहां है बहुत उपयोगी है और बिस्मार्क ने चीजों को चोटी तक पहुंचाने के लिए दूसरे राजनेताओं से कहीं ज्यादा किया है।
मैंने डॉ. कार्ल मार्क्स से पूछा कि वह बिस्मार्क के बारे में क्या सोचते हैं?
उन्होंने जवाब दिया, ‘जब तक नेपोलियन पराजित नहीं हुआ था वह महान विजेता था, जीनियस था और पराजित हो गया तो मूर्ख कहलाया। बिस्मार्क का भी यही हाल है। उसने निरंकुशता से एकीकरण का कार्यक्रम चलाया। लेकिन यह भी असफल होगा। भले नेपोलियन की अनुकृति न हो। जर्मनी और फ्रांस के समाजवादियों ने 1870 के युद्ध के विरुद्ध प्रदर्शन किया है क्योंकि यह उनकी नियति बना दिया गया है। जारी घोषणापत्र में जर्मन के लोग कहते हैं अगर वो तथाकथित बचाव के युद्ध  को अनुमति देंगे तो यह विजय के युद्ध में परिवर्तित हो जायेगा। तब जर्मनी की प्रगतिशील जनता निरंकुश सैन्य तंत्र द्वारा दंडित होगी। जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ने जगह जगह सभाएं करके और घोषणापत्र प्रकाशित करके फ्रांस के साथ एक सम्मानजनक शांति की वकालत की है। इससे तमाम राजनेता प्रभावित हुए हैं और प्रशियन सरकार ने भी इस पर कार्रवाई की है। अभी भी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के नायब ने जर्मन संसद में फ़्रांसीसी प्रदेश के ताकत के बल पर कब्जे के विरुद्ध आंदोलन का साहस किया है और बहुत उत्साह से ऐसा किया है। लेकिन बिस्मार्क पर इसका असर नहीं हुआ। बिस्मार्क अपनी नीति को जबरदस्ती ताकत के बल पर आगे बढ़ाया और लोग महान बिस्मार्क के विरुद्ध बोलने लगे। युद्ध लड़ा गया और जब वह जीत नहीं सका तो असाधरण रूप से उसके इस मौलिक विचार को असफल करार दिया गया। उस पर से भरोसा उठ गया। उसकी लोकप्रियता बेहद घट गयी। उसे धन  चाहिए था क्योंकि धन  राज्य को चाहिए था। उसने संवैधानिक छल के जरिये लोगों पर सेना और अपनी पुनर्गठन योजना के लिए जबरदस्त कर लगा दिये जबकि वह बहुत लम्बे समय तक ऐसा नहीं कर सकता था मगर उसने ऐसा किया और अब तो उसने ऐसा करने के लिए संविधन की भी जरूरत नहीं समझी। टैक्स को बरकरार रखने के लिए उसने समाजवाद के भूत को चुना उसका दुष्प्रचार  किया और इसके नाम पर सब कुछ अपने कब्जे में कर लिया।
क्या दंगा भड़काने के लिए?’, ‘क्या आपको बर्लिन से निरंतर हालचाल, सलाह मिलती है?’

हां, मेरे दोस्त मुझे चीजों से निरंतर अवगत कराते हैं। यह शानदार शांत राज्य है और बिस्मार्क निराश है। उसने 48 महत्वपूर्ण लोगों को वतन बदर कर रखा है। जिनमें नायब हेजलमैन तथा फ्रीज  और राको, बाउमैन व आजाद प्रेस के एडलर शामिल हैं। इन लोगों ने बर्लिन के लोगों को चुप करा रखा था। बिस्मार्क यह बात जानता था। वह यह भी जानता था कि बर्लिन में 75 हजार मजदूर भुखमरी का शिकार हैं। एक बार जब उनके नेता गये, उसे विश्वास था कि भीड़ उठेगी और इस तरह उसे नरसंहार का बहाना मिल जायेगा और इसके साथ ही वह जर्मन साम्राज्य पर नकेल कस सकेगा। खूनखराबे की उसकी यह छोटी सोच उस समय भयावह रूप में बाहर आयी जब उसने लोगों पर लगाये करों को किसी भी हद तक बढ़ाता गया लेकिन कोई दंगा नहीं हुआ। इस स्थिति से वह बेचैन है और तमाम राजनेता उसकी खिल्ली उड़ा रहे हैं।


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