मैं सबसे अलग होना चाहती थी
मर्लिन मुनरो की कहानी उसी की जुबानी
अमेरिकी फिल्म अभिनेत्री मर्लिन मुनरो (1926-62) नोर्मा जीन बेकर के रूप में पैदा हुई थी। वह ली स्ट्रासबर्ग के अभिनेता स्टूडियो में पढ़ी थी और हाॅलीवुड के कालजयी सेक्स प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध हुई। उसने जिन फिल्मों में काम किया उनमें से प्रमुख हैं- बस स्टाॅप, सम लाइक इट हाॅट, जेंटलमैन प्रेफर ब्लोंडेस और द मिस फिट। उसकी पहली शादी बेसबाॅल खिलाड़ी जो डाइमैगिओ से हुई थी और उसके बाद उसने नाटककार अर्थर मिलर से शादी की। लेकिन यह शादी भी अंत तक न चल सकी। सन 1961 में मुनरो का मिलर से तलाक हो गया। गहरी विक्षिप्तावस्था में जाने से पहले उसके दोनों केनेडी बंधुओं, जान एफ केनेडी तथा बाॅबी केनेडी के साथ संबंध रहे। विक्षिप्तावस्था में ही उसने नींद की गोलियां खाकर खुदकुशी कर ली। वह बिरले ही इंटरव्यू दिया करती थी। उसके जीवन में यह अंतिम साक्षात्कार फ्रेंच पत्रकार जार्जस बेलमोंट ने लिया था जो कि लगभग एकालाप (खुदबयानी) जैसा है। इस साक्षात्कार से पता चलता है कि पर्दे पर अपनी सेक्सी छवि से विस्मित कर देने वाली मुनरो बुद्धिमान और विचारशील भी थी। लोगों में मुनरो के इस विमुग्ध कर देने वाले जादू का ही असर था कि टुमैन कैपोटे और डब्ल्यू.जे. ने इस अंतिम संवाद को मुनरो के मरने के कुछ सालों बाद रिकार्ड बार छापा। पहली बार यह फ्रेंच पत्रिका मेरी क्लेयर में 1960 में छपा। इसे सदी का सबसे चर्चित सुंदरी के सबसे महत्वपूर्ण साक्षात्कारों में से माना जा सकता है।
लब्ध प्रतिष्ठित फ्रेंच पत्रकार जाॅज्र्स बेलमोंट का जन्म 1909 में हुआ था। उन्होंने इकोल नाॅर्मले सुपीरियर से अंग्रेजी में डिप्लोमा हासिल किया था। 1932 से 1940 तक उन्होंने ‘पेरिस-मिडी’ और ‘पेरिस-सोएर’ नामक पत्रिकाओं के लिए कविताओं और तमाम पत्रिकाओं की समीक्षाएं लिखीं। वह ‘वोलोन्टस’ पत्रिका के निदेशक और (नेमंड क्यूनेऊ, हेनरी मिलर, ली कोर्विजियर और फ्रेडरिक जोलियट कूरे के साथ) संस्थापक थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1941-43 में वह युवा मामलों के सचिवालय में महानिदेशक के तौर पर काम किया। 1945 से 1953 तक राबर्ट लाफोंट प्रकाशन में साहित्यिक निदेशक रहे। इसके बाद वे पेरिस मैच के जरिए पुनः पत्रकारिता में लौटे। वह कई पत्रिकाओं के संपादक रहे जिनमें प्रमुख हैं- जूर्स डिफ्रांस, मेरी क्लेयर एंड आई, एक्शन आटोमोबाइल इत्यादि। 1964 से 1979 तक वह पुनः राॅबर्ट लाफोंट प्रकाशन में अपने पुराने पद पर चले गये। इसके बाद 1980 से 1985 तक वह एक्रोपोल नामक एक अन्य प्रकाशन में साहित्य निदेशक रहे। वह फ्रांसीसी उपन्यासों को अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले एक विशिष्ट अनुवादक के तौर पर भी प्रसिद्ध हैं। उन्होंने जिन प्रसिद्ध लेखकों के काम का तर्जुमा किया है, उनमें हैं- ग्राहम ग्रीन, इवेलियन वाॅद्य, अंथोनी बर्गीस, हेनरी जेम्स और इरिका जोंग। उनके तीन उपन्यास और एक मित्र हेनरी मिलर के साथ साक्षात्कारों की एक किताब प्रकाशत हो चुकी है जिसका शीर्षक है ‘फूस टू फेस विद हेनरी मिलरःकनवर्सेसन्स विद जाज्र्स बेलमोंट (1971)’। प्रस्तुत है उनके द्वारा लिया गया मर्लिन मुनरो का ऐतिहासिक साक्षात्कार-
मर्लिन मुनरो- मैं सवालों के जवाब देना पसंद करूंगी क्योंकि मैं सरलता से पूरी कहानी नहीं कह सकती। यह सब कुछ बहुत भयानक है..कहां से शुरू करूं और कैसे? इसमें तमाम उतार-चढ़ाव हैं।
जाज्र्स बेलमोंट- ठीक है, इसे कहीं न कहीं से तो शुरू करना ही है। चलिए अपने बचपन की शुरुआती यादों से ही शुरू करिए।
मर्लिन मुनरो- ये अस्तित्व के लिए संघर्ष की यादें हैं। मैं तब बहुत छोटी थी बिस्तर में पड़ी एक मासूम बच्ची। और में जीवन के लिए संघर्ष कर रही थी। लेकिन इस पर मैंने कभी किसी से कुछ नहीं कहा। क्योंकि यह चाहे जितनी क्रूर कहानी हो, इससे किसी को कुछ नहीं लेना। यह मेरी अपनी जिंदगी है। नितांत अपनी। जिसे मैं बयान कर रही हूं।यह सही है कि मैं नाजायज औलाद थी। मेरी मां के पहले पति का नाम बेकर और दूसरे का नाम मोर्टेसन था। लेकिन जिस समय मैं पैदा हुई तब तक मेरी मां दोनों द्वारा तलाक दी जा चुकी थी। जब मैं बहुत छोटी थी, तब मुझे हमेशा बताया जाता था कि मेरे पिता की मेरे जन्म से पहले ही न्यूयार्क में एक कार दुर्घटना से मौत हो गयी थी। यह काफी आश्चर्यजनक है कि मेरे जन्म प्रमाणपत्र में पिता के व्यवसाय वाले खाने में ‘बेकर’ शब्द लिखा है जो कि मेरी मां के पहले पति का नाम है। जब मैं पैदा हुई मेरी मां ने मुझे एक नाम दिया। मैं ऐसा सोचती हूं, उसने बहुत तेजी से सोचने की कोशिश की और बोली ‘बेकर’। विशुद्ध संयोग...अंततः मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचती हूं।
खैर! मेरा नाम नोर्माजीन बेकर था। यह नाम मेरे सभी स्कूल रिकार्ड्स में है। इस नाम के अलावा मेरी हर चीज में पागलपन है। युद्ध के दौरान मैं एक फैक्ट्री में काम करती थी। काम बेहद उबाऊ था, लेकिन यहां जीवन खतरनाक रूप से रूचिकर था। यहां लड़कियां इस पर बात किया करती थीं कि उन्होंने रात में क्या किया और इस सप्ताहांत क्या करने जा रही हैं। मैं उस जगह काम करती थी जहां पेंट स्प्रे करने वाले होते थे-उनकी आदमी होने के अलावा और कोई हैसियत नहीं थी। वे मुझ पर ध्यान देते थे और इसके लिए अक्सर अपना काम छोड़ देते थे।
...और तभी एक दिन वायुसेना ने हमारी फैक्ट्री की तस्वीर लेनी चाही। मैं यहां कुछ दिनों से एक माॅडल के रूप में काम करती थी। यहां तमाम चीजों को हासिल करना उन्हें अपने से दूर जाने देना मेरे हाथ में था।
तस्वीरें इस्टमैन कोडक में धुलाई गयी थीं और इन्हें जो भी देखता था यह जरूर पूछता था कि तस्वीर में यह माॅडल कौन है? छायाकारों में से एक डेविड कंवर पलटकर मेरे पास आये और बोले, ”तुम्हें एक माॅडल बनना चाहिए, जहां तुम सरलता से पांच डालर प्रति घंटे कमा सकती हो।“ 5 डालर प्रति घंटे से मैं चकित हो गयी क्योंकि यहां 20 डालर पूरे हफ्ते में 10 घंटे प्रति दिन कमा पाती थी। वह भी कंक्रीट की फर्श में खड़े रहने के बाद ये कारण काफी थे कि मैं उस छायाकार के सुझाव पर अमल करने की कोशिश करूं ताकि अपने स्वप्न को साकार कर सकूं और निस्संदेह मैं इसके लिए सक्षम थी। इसके लिए मैंने समय-समय पर नाटकों के सबक सीखे जब मेरे पास काफी पैसा आ गया। हालांकि ये मंहगे थे, मैंने प्रति घंटे 10 डालर के हिसाब से कीमत अदा की।
मैं तमाम लोगों को जानती हूं जिनमें दोनों तरह के लोग हैं अच्छे भी और बुरे भी। कभी-कभी जब मैं बस की प्रतीक्षा कर रही होती हूं तो कई लोग अपनी कार रोकते हैं और खिड़की का शीशा नीचे करके कहते हैं, ”अरे तुम यहां क्या कर रही हो? तुम्हें तो फिल्म में होना चाहिए।“ इसके बाद ये व्यक्ति मुझे घर छोड़ देने की बात कहते थे। ऐसे लोगों से मैं हमेशा कहती थी, ”नहीं, धन्यवाद। मेरे लिए बस ज्यादा सही है।“ लेकिन ऐसी बातों से पिक्चर में होने का विचार पूरे समय मेरे दिमाग में मथता रहता था। निस्संदेह तमाम ऐसे लोग भी थे, जो कहते थे, ”तुम जाकर किसी जनरल स्टोर में काम क्यों नहीं हासिल कर लेती।“ लेकिन मैं नहीं जानती थी कि यह सब कैसे मिलता है। एक बार मैं एक सस्ती दर के स्टोर में काम के लिए गयी थी। लेकिन मैं वहां काम न पा सकी क्योंकि हाईस्कूल पास नहीं थी। उन्होंने इसी वजह से मुझे नहीं लिया। यह सचमुच कितना भिन्न था। एक साथ एक माॅडल होना, एक अभिनेत्री बनने की ख्वाहिश पालना और एक जनरल स्टोर में काम तलाशना।
कैलेंडर की उन तस्वीरों को लेकर अनेक कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन जब तक ये कहानियां परिदृश्य में आयीं उससे पहले ही मैं ‘असफाल्ट जंगल’ कर चुकी थी और फाॅक्स द्वारा सात वर्षों का पुर्नअनुबंधित की जा चुकी थी। लेकिन मुझे आज भी याद है कि तब भी प्रचार विभाग वाले मुझसे मंच में आने पर पूछते थे, ”क्या तुमने कैलेंडर के लिए कोई पोज दिया?“ मैं उनसे कहती, ”हां, क्या कुछ गलत किया?“ मेरे जवाब से ये लोग सचमुच चिंतित होते और कहते, ”तुम ऐसा मत कहो कि तुमने पोज दिया। तुम हमेशा यही कहो कि तुमने नहीं दिया।“ इस पर मैं कहती, ”लेकिन मैंने ऐसा किया है और मैंने इसके अनुबंध पर दस्तखत भी किए हैं, इसलिए मुझे लगता है कि मैंने जो कुछ किया है उसे साफ-साफ कहना भी चाहिए।“ इस पर वे बहुत अप्रसन्न हुए थे। फिल्म का छायाकार मेरे एक कैलेंडर को लेकर मेरे पास आया और मुझसे कहा, ”क्या तुमने यह खुद किया है?“ मैंने कहा, ”हां, मैंने किया है। लेकिन यह मेरा सर्वोत्तम पोज नहीं है, समझे“ और स्टूडियो में इससे खुशी की लहर दौड़ गयी।
जो भी मुझे जानता है, वह इस बात को भलीभांति समझता है कि मैं झूठ नहीं बोल सकती। कभी-कभार मैं चीजों को यूं ही छोड़ देती हूं या यूं कहें कि अपने आप का बचाव नहीं करती। लेकिन लोग बड़े कमाल के होते हैं, वे आप से कोई सवाल करें और जब आप उनके सवाल का ईमानदारी से जवाब देंगे तो उन्हें धक्का लगता है। अब इसी बात को लीजिए कुछ लोगों ने मुझसे एक बार पूछा, ”मैं बिस्तर में क्या पहनती हूं? पायजामा टाॅम्स, बाटम्स या फिर नाइट गाउन?“ इस पर मैंने जवाब दिया, ”चैनल नंबर फाइव।“ क्योंकि सच्चाई यही थी। मगर आप देखो कि मैं नग्न नहीं कहना चाहती थी लेकिन सच्चाई यही थी। एक ऐसा समय भी आया जब मैंने यह कहना शुरू किया कि कोई व्यक्ति नहीं जानता कि उस समय मैं क्या करती होती हूं जब शूटिंग नहीं कर रही होती। चूंकि मैं फिल्मों के पूर्वालोकन समारोहों और पार्टियों में नहीं जाती थी।इसलिए लोगों की मेरे बारे में उत्सुकता स्वाभाविक थी। जबकि मेरे वहां न होने के पीछे बहुत सरण कारण थे। दरअसल मैं स्कूल जाने लगी थी। चूंकि मैं कभी हाईस्कूल पास नहीं कर सकी इसलिए मैंने रात्रि में यूसीआईए जाना शुरू किया। दिन में जाना मेरे लिए संभव नहीं था क्योंकि दिन में, मैं फिलमों में काम करती थी। हालांकि मैं इन फिल्मों का एक मामूली हिस्सा भर ही थी। अपनी इस रात्रि शिक्षा में मैंने पढ़ने के लिए विषय चुने ‘साहित्य का इतिहास’ और ‘अमेरिका का इतिहास’, मैंने अपनी इस पढ़ाई के दौरान तमाम लेखकों की दिलचस्प कहानियां पढ़ीं।
मेरे लिए कक्षा में समय से पहुंचना कठिन होता था। क्योंकि मैं स्टूडियो में शाम साढ़े छह बजे तक काम करती थी। यही नहीं सुबह मुझे बहुत जल्दी उठना पड़ता था ताकि मैं 9 बजे से पहले शूटिंग के लिए तैयार हो जाऊं। मैं हमेशा सजग रहती थी लेकिन फिर भी कई बार कक्षा में सो जाती थी। लेकिन उस समय मैं अपने आप पर लगातार उठकर बैठने और सुनने का दबाव बनाये रखती थी।
मेरी प्रोफेसर सुश्री सेया ई नहीं जानती थी कि मैं काॅन हूं? उन्हें कई बार यह सब कुछ अटपटा लगता था जब दूसरी कक्षाओं के लड़के मुझे खिड़की से देखते और आपस में फुसफुसाते। एक दिन उन्होंने उन लड़कों से मेरे बारे में पूछा, जिस पर उन्होंने बताया, ”वह एक सिने अभिनेत्री है।“ इस पर प्रोफेसर सेसा ई का कहना था, ”अच्छा! मैं बहुत आश्चर्यचकित हूं। मैं तो समझती थी कि वह बस कानवेंट पास करने वाली एक छोटी सी लड़की है।“ पूरे जीवन में मुझे मिली यह सबसे सुंदर प्रशंसा है। लेकिन वे लोग मैं जिनके बारे में बातें कर रही हूं, मुझे हमेशा एक नायिका, कामुक, चंचला और विस्मित कर देने वाली के रूप में देखना चाहते थे। मेरे बारे में हमेशा एक धारणा रही है कि मैं लेटलतीफ रहने वाली हूं। लेकिन मैं नहीं मानती कि मैं हमेशा ही लेटलतीफ होती हूं। दरअसल लोग सिर्फ उन्हीं मौकों को याद रखते हैं जब मैं सचमुच कहीं बहुत लेट पहुंची। हालांकि मैं सचमुच नहीं सोचती कि मैं कभी इतना तेज चल सकूंगी जितना कि दूसरे लोग चलते हैं। लोग कारों में बैठते हैं और चलते रहते हैं कभी नहीं रूकते। एक दूसरे से होकर गुजरते रहते हैं। मेरे लिए यह सब कर पाना बहुत कठिन है। मैं नहीं सोचती कि मानव जाति का अभिप्राय, मशीनों में तब्दील हो जाना था। मैं समझती हूं कि यह समय की महाबर्बादी है। लेकिन भागमभाग की बजाय आराम से करने पर आप ज्यादा और समझदारी भरा काम कर सकते हैं।
यदि मुझे स्टूडियो पहुंचकर मेकअप कराना पड़ता है, केश सज्जा करानी पड़ती है और खास पोशाक पहननी पड़ती है तो मैं कोई दृश्य करने के पहले इसी सबमें थक जाती हूं। शायद यही कारणा था कि जब हमने ‘लेट अस मेक लव’ की तो जार्ज कुकर ने महसूस किया कि मेरे लिए बेहतर यही होगा कि मैं एक घंटे देरी से आ जाया करूं ताकि मैं दिन के अंत तक तरोताजा रह सकूं। मेरा मानना है कि फिल्मों में अभिनेताओं को हर हाल में ज्यादा देर तक काम करना पड़ता है।
मुझे लगता है कि आज हमारी जिंदगी में बहुत भागमभाग है। यही कारण है कि लोग अपने जीवन और खुद अपने आपसे विकल व नाखुश हैं। ऐसे हालातों में आप कोई काम परिपूर्ण कैसे कर सकते हैं? परिपूर्णता के लिए समय चाहिए। मैं एक सच्ची और अच्छी अदाकारा होना चाहती हूं। मैं खुश रहना चाहती हूं। लेकिन खुश कौन है? मैं सोचती हूं कि खुश रहने का प्रयास करना उतना ही कठिन है जितना एक अच्छी अदाकारा होना। आपको दोनों के लिए कठिन प्रयास करना होगा।
यदि मैं अपने काम में कुछ निश्चित चीजों का एहसास करती हूं तो खुश रहती हूं। लेकिन ऐसा सिर्फ किसी क्षण ही होता है। मैं ज्यादातर समय खुश नहीं रहती। यदि मैं कभी खुश होती हूं तो मैं पाती हूं कि मैं ज्यादातर दुखी ही रहती हूं। मैं अपनी व्यक्तिगत जिंदगी को अपने काम से अलग नहीं कर पाती। मेरा तो अनुभव है कि मैं जिन क्षणों में जितना ही ज्यादा बिजी होकर अपना काम करती हूं उन क्षणों में उतनी ही ज्यादा प्रोफेशनल होती हूं।
मेरी समस्या है कि मैं स्वतः संचालित हूं मगर समझिए कि मैं असाधारण बनना चाहती हूं। मुझे पता है कुछ लोग इस पर हंसते हैं, लेकिन सच यही है। एक बार न्यूयार्क में मेरा वकील मुझे कर छूटों के बारे में बता रहा था और खा-म-खा मेरा फरिश्ता बनकर मुझे दिलासा दिये जा रहा था। मैंने उससे कहा, ”मैं यह सब नहीं जानना चाहती। मैं सिर्फ असाधारण बनना चाहती हूं।“ लेकिन आज जब इस तरह की चीजें किसी वकील से कहते हैं तो वह समझता है कि आप पागल हैं।
रेनर मारिया रिल्के द्वारा लिखी किताब ‘लेटर्स टू ए यंग पोएट’ ने मेरी काफी मदद की। मैं सोचती हूं कि इसको पढ़ने से पहले मैं कभी-कभी पागल हो जाया करती थी। मैं सोचती हूं कि जब मेरे अंदर बैठा कलाकार मुझे भूल जाता है तब मैं एक कलाकार बन रही होती हूं। हालांकि कुछ लोग इस बात पर हंसेंगे, यही बात है कि मैं ऐसे लोगों से इस बात के लिए माफी मांग लेती हूं। जब एक कलाकार सच्चे होने का प्रयास करता है तो आप यह महसूस करेंगे कि आप एक प्रकार के पागलपन की सीमा पर हैं। वास्तव में यह पागलपन नहीं है। दरअसल आप अपने भीतर के सबसे सच्चे भाग को बाहर ला रहे होते हैं। यह बेहद कठिन काम है। क्या आप जानते हैं? बहुत बार ऐसा होता है कि आप सोचते हैं कि मेरे पास जो है सब कुछ सच ही है लेकिन वास्तव में यह इतनी आसानी से नहीं होता है।
मेरे मन में यह हमेशा गुप्त अनुभूति होती है जैसे कि मैं सचमुच नकली होऊं या कोई खोटी चीज। मेरा अनुमान है हर आदमी आज भी और पहले भी ऐसा ही सोचता है। एक्टर्स स्टूडियो में मेरे गुरु लीस्ट्रासबर्ग प्रायः मुझसे एक सवाल किया करते थे, ”तुम अपने बारे में ऐसा क्यों सोचती हो? आखिर तुम भी तो एक इंसान हो।“ मैंने जवाब दिया, ”हां, मैं हूं। लेकिन मैं महसूस करती हूं कि मुझे और ज्यादा होना चाहिए।“ वह कहते, ”नहीं, तुम्हें अपने आप से इसकी शुरुआत करनी होगी। तुम इसके लिए क्या कर रही हो?“ ”मुझसे?“ मैं पहली बार चिल्लाई। उन्होंने कहा, ”हां, तुमसे।“
मैं सोचती हूं कि मेरे जीवन में जितना ली ने परिवर्तन किया, उतना किसी और आदमी ने नहीं किया। यही कारण है कि मैं जब भी न्यूयार्क में होती हूं तो मैं एक्टर्स स्टूडियो ही जाना ज्यादा पसंद करती हूं। मेरी एक ही इच्छा है कि मैं जितना अच्छा कर सकती हूं उतना अच्छा करूं, कैमरे के शुरू होने से लेकर उसके बंद होने तक। उस क्षण मैं परिपूर्ण बनना चाहती हूं जितना परिपूर्ण मैं बन सकती हूं। मेरे लिए मेरी भावनाएं उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितना कि मेरा काम महत्वपूर्ण है। शायद यही कारण है कि मैं जल्दबाज और विशिष्ट हूं। मैं लोगों को पसंद करती हूं लेकिन जब वे मित्र बन जाते हैं तो उनमें से केवल कुछ को ही पसंद करती हूं। जब मैं प्यार करती हूं तो मैं इतनी विशिष्ट हो जाती हूं कि मेरे दिमाग में तब सिर्फ यही एक बात होती है। इसमें सबसे बड़ी बात यही है कि मैं सिर्फ एक आदमी की तरह के व्यवहार की अपेक्षा करती हूं।
जब मैं आर्थर मिलर से पहली बार सेट पर मिली, तो उस समय मैं चिल्ला रही थी। मैं उस समय ‘ऐज यंग ऐज यू फील’ फिल्म में काम कर रही थी। आर्थर मिलर और इलिया कोजान मेरे पास आये। मैं चिल्लाने का अभिनय कर रही थी क्योंकि मेरे एक दोस्त की मृत्यु हो गयी थी। उसी समय मेरा परिचय आर्थर मिलर से हुआ।
यह सन 1951 की बात है। इस समय तक मेरा जीवन ठीकठाक चल रहा था। फिर चार सालों तक मैं आर्थर मिलर से नहीं मिली। हमारे बीच संवाद था। वह मुझे पढ़ने के लिए किताबों की एक सूची भेजी। मैं प्रायः यह सोचती थी कि वे फिल्मों मंे तो मुझे देख ही लेते थे। इसलिए मैं अच्छे से अच्छा अभिनय करने का प्रयास करती थी।
मैं नहीं जानती कि मैं इसे कैसे बयां करूं। मैं तो पहली ही नजर में उनसे प्यार करने लगी थी।
मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकती जब उन्होंने कहा था कि मैं स्टेज पर अभिनय करूं और हमारे आसपास खड़े लोग इस बात पर हंस पड़े थे। लेकिन उन्होंने कहा, ”नहीं, मैं यह गंभीरता से कह रहा हूं।“ उन्होंने यह बात जिस लहजे में कही थी मैं यह समझ सकती थी कि वह एक संवेदनशील इंसान थे और मुझे भी वह संवेदनशील समझ रहे थे। इसे वर्णित कर पाना तो बहुत मुश्किल था। लेकिन यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात है।
जब से हमारी शादी हुई तब से जब मैं हाॅलीवुड में नहीं होती उन दिनों न्यूयार्क में खुशी का जीवन व्यतीत करती हूं। सप्ताहांत में ज्यादातर हम अपने कनेक्टीकट के मकान में होते हैं। सुबह के समय मेरे पति बहुत सवेरे से ही अपना काम शुरू कर देते थे। वह प्रायः सुबह छह बजे उठ जाते थे। बाद में वह दिन में थोड़ी झपकी ले लेते थे। हमारा एपार्टमेंट बहुत बड़ा नहीं था। इसलिए उनकी पढ़ाई में किसी प्रकार का खलल न हो इसलिए मैंने उनका अध्ययन कक्ष साउंड प्रूफ रखा था। जब वह काम करते थे तो पूरी तरह से शांति चाहते थे।
मैं सुबह साढ़े आठ या इसके बाद ही उठा करती थी। हमारे एक अच्छा रसोइया था। मैं सुबह प्रायः अपने नाश्ते के बनने का इंतजार किया करती थी। मैं अपने कुत्ते हूगो को सैर के लिए लेकर जाती थी। जब कभी हमारा रसोईया नहीं होता था उस दौरान मैं आर्थर के लिए स्वयं ही नाश्ता तैयार किया करती थी क्योंकि मैं सोचती थी कि पति को अपना भोजन स्वयं नहीं बनाना चाहिए। इस मामले में मैं पुराने खयालात की हूं। मुझे यह भी पसंद नहीं था कि पति, पत्नी का कोई सामान मसलन सैंडिल,पर्स वगैरह उठाये। मैं भले ही उनकी जेब में कुछ कंघी वगैरह छुपाकर रख लेती थी लेकिन ऐसी कोई चीज ले जाना मुझे पसंद नहीं था जो बाहर से दिखायी देती हो।
नाश्ते के उपरांत, छुट्टी वाले दिन मैं नहाती थी ताकि उस दिन को काम के दिनों से अलग कर सकूं। मैं जब सुबह 5 या 6 बजे जगती थी तो अपने आपको जगाने और तरोताजा करने के लिए ठंडे पानी के फव्वारे में नहाती थी। न्यूयार्क में तो मैं टब में भीगर संगीत सुनते हुए ‘न्यूयार्क टाइम्स’ पढ़ा करती थी। इसके बाद मैं स्कर्ट और कमीज पहनकर बिना ऊंची एड़ी के जूते पहनती और पोलो कोट पहनकर मंगलवार और शुक्रवार के दिन 11 बजे एक्टर्स स्टूडियो पहुंचती। अन्य दिनों में मैं लीस स्ट्रासबर्ग की प्राइवेट कक्षाओं में जाया करती थी। कभी-कभी मैं लंच के दौरान घर आ जाती थी और रात के खाने के पहले और बाद का समय खाली रखती थी ताकि मैं अपने पति को समय दे सकूं। रात के खाने के दौरान हमारे यहां हमेशा संगीत बजता था। हम दोनों को ही शस्त्रीय संगीत बेहद पसंद था। यदि इच्छा होती तो हम जाॅज भी बजाते थे लेकिन ज्यादातर समय हम जाॅज तभी बजाते जब कभी हम शाम को पार्टी देते। उस समय हम उसकी धुन पर नाचते भी थे। आर्थर बीच-बीच में झपकी लेकर अपने काम में लग जाते थे। मेरे पास हमेशा करने के लिए बहुत सारा काम होता था। आर्थर के पहली शादी से दो बच्चे थे और मेरा हमेशा यह प्रयास रहता था कि मैं उन बच्चों के लिए अच्छी सौतेली मां साबित होऊं। एपार्टमेंट में करने के लिए बहुत सारा काम होता था। शहर में तो मैं काफी व्यस्त रहती थी लेकिन अपने देश में रहते हुए मुझे घर में खाना बनाना पसंद था। आप जानते हैं कि मैं ब्रेड और नूडल्स बना सकती हूं उन्हें रोल करके सुखा करके मैं साॅस बना सकती हूं। मुझे विशेष तौर पर यही पसंद था। मैं कभी-कभी नई-नई विधियों से खाना बनाया करती थी। मुझे मिर्च मसाले बेहद पसंद हैं। मुझे अदरक अच्छी लगती है।
स्टूडियो से तब भी आज की ही तरह कई अभिनेता मेरे पास आया करते थे। मैं उन्हें नाश्ता और चाय दिया करती थी। हम खाते-खाते पढ़ा करते थे। मेरे वे दिन बेहद खुशी से भरे दिन थे। मैं प्रायः अपनी शामें अपने पति के लिए खाली रखा करती थी ताकि मैं उनके साथ ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत कर सकूं।
रात के भोजन के बाद हम प्रायः थियेटर जाया करते या सिनेमा देखते थे। अपने दोस्तों को या तो घर बुलाया करते थे या उनके घर जाते थे। जब कभी हम घर पर होते, तो पढ़ते, बातें करते या फिर संगीत सुना करते। सेंट्रल पार्क में रात के खाने के बाद घूमने जाया करते थे। हम कभी-कभी सैर करना पसंद करते थे। हम चीजों को हमेशा एक ही ढंग से नहीं करते थे। कभी-कभी मैं ज्यादा संयोजित होकर काम करती थी, मेरे पति मुझे कहते थे कि ऐसा ही ठीक है, इस तरह बोरियत नहीं होती। मैं चीजों से बोर नहीं होती, मैं तो बोर लोगों से ही बोर होती हूं।
मैं लोगों को पसंद करती हूं लेकिन कभी-कभी हैरानी होती है कि मैं कितनी सामाजिक हूं। मैं अकेले रहना भी पसंद करती हूं। अकेलापन मुझे जरा परेशान नहीं करता। इससे मुझे आराम ही मिलता है। इस तरह के आराम से मैं तरोताजा हो जाती हूं। मैं आदमी के बारे में दो बातें सोचती हूं। खासतौर से अपने बारे में। वे अकेले भी होना चाहते हैं और दोनों साथ भी होना चाहते हैं। मैं खुश भी रहती हूं तो दूसरी ओर उदास भी हो जाती हूं। मैं इसके प्रति बेहद संवेदनशील हूं। यही कारण है कि मैं अपने काम से बेहद प्यार करती हूं। जब मैं उसके साथ खुश होती हूं मैं अपने आप को ज्यादा सामाजिक पाती हूं। यदि ऐसा नहीं होता तो मैं अकेले रहना पसंद करती हूं। मेरी निजी जिंदगी में भी ऐसा ही है।
जाज्र्स बेलमोंट- यदि मैं आपसे यह सवाल करूं कि जीवन के इस दौर में आप मर्लिन मुनरो होने पर कैसा महसूस कर रही हैं, तो आपका जवाब क्या है?
मर्लिन मुनरो- आपको अपने होने पर कैसा लग रहा है?
जाज्र्स बेलमोंट- मैं कभी अपने आपसे सहमत होता हूं कभी-काी असंतुष्ट भी होता हूं।
मर्लिन मुनरो- ठीक! बिल्कुल ऐसा ही मेरे भी साथ है।
जाज्र्स बेलमोंट- क्या तो मैं यह मानूं कि आप खुश हैं?
मर्लिन मुनरो- हां! ऐसा ही है। अभी मेरी उम्र केवल 34 साल है और अभी कुछ साल ऐसे और हैं। मैं भी खुश हूं। मुझे आशा है कि मुझे और अच्दा करने, खुश होने के लिए मेरे पास पर्याप्त समय है। व्यक्तिगत जीवन में ही नहीं अपने प्रोफेशन के तौर पर भी। मेरा सिर्फ यही एकमात्र उद्देश्य है। हो सकता है मुझे थोड़ा ज्यादा वक्त लगे क्योंकि मैं जरा धीमे हूं। मैं यह नहीं कहना चाहती कि यह सबसे अच्छी विधि है। लेकिन मेरे लिए तो यही है। मैं यह बात अच्छी तरह से जानती हूं कि सब कुछ होने के बावजूद जीवन में आशा है। लेकिन यह आशा मद्धिम पड़ गयी है। अंतिम दिनों में इस सुंदरी ने आत्महत्या कर ली।
अनुवाद/प्रस्तुति: लोकमित्र-वीना सुखीजा






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